हरित क्रांति ने किस तरह खेती संकट को बढ़ावा दिया?

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एकल फसली प्रणाली में खेत में बाकि सब कुछ खरपतवार या कीट बन जाता है। कीट मारने के लिए कीटनाशक का प्रयोग करना पड़ता है पर इस से कीट पूरी तरह से मरते नहीं हैं। जो बच जाते हैं वे pesticide-resistant हो जाते हैं । वो और ताकतवर बन जाते हैं। फिर पहली दवाई से उनका नियंत्रण नहीं होता है। बार बार दवा डालनी पड़ती है और कई बार और ताकतवर दवाइयों का प्रयोग करना पड़ता है। लेकिन इससे खर्च बढ़ जाता है और समाधान पूरी तरह से नहीं हो पाता है। जैसे देखें तो एक किस्म का कीड़ा ख़तम भी हो जाये तो दूसरे किस्म का कीड़ा या बीमारी पैदा हो जाती है। असंतुलित हो जाता है सब कुछ। और किसान फँस जाता है। 

जब तक वैज्ञानिक और कम्पनियाँ नए बीज और नए कीटनाशक ईजाद करते रहेंगे तब तक गाड़ी तो चलती रहेगी, लेकिन खर्चे भी बढ़ते जाएंगे । और नए नए कीट आते जाएंगे। इसे कहते हैं technological treadmill । ऊपर से इन दवाइयों का बहुत बुरा असर पड़ता है सेहत पर। पंजाब जैसी जगह में इतना पानी नहीं है। नए बीजों को बहुत पानी कि ज़रुरत थी और इसकी पूर्ती ट्यूबवेलl से हुई। पर धीरे धीरे धरती से पानी निकाल निकाल कर पानी का स्तर नीचा होने लगा और उतना ही पानी निकालने में ज़्यादा खर्च लगने लगा। इससे प्रकृति का दोहन भी हुआ। और आगे चलके पानी की उपलब्धता कैसे होगी इस पर बड़ा सवाल भी खड़ा हो गया है।

इसी तरह शुरू के कुछ सालों में उत्पादन और उत्पादकता दोनों बहुत ऊंचे थे। यह सिर्फ नए बीज, या पानी और रासायनिक खाद के कारन नहीं था। यह इसलिए भी था क्योंकि मिट्टी में पर्याप्त मात्रा में प्राकृतिक तत्त्व  था, जिसे प्राकृतिक कार्बन कहते हैं। पर धीरे धीरे वो कार्बन ख़त्म होता चला गया और उसको बढ़ाने की कोई कोशिश नहीं कि गयी। बल्कि रासायनिक खाद के कारन जो जीवाणु थे मिटटी में, वे भी ख़त्म हो गए जिससे मिटटी कि उर्वरक क्षमता कम हो गयी । अब ऐसी परिस्थिति है कि जितना उत्पादन पहले 10 यूनिट रासायनिक खाद डालने से मिलता था, अब उतना उत्पादन पाने के लिए 20, 30, 40 यूनिट डालना पड़ रहा है। इससे भी खर्चे बढ़े हैं। 

तो जब खर्चे इतने बढ़ रहे हैं तो किसान कैसे संभल पायेगा? 

शुरू में पंजाब के किसानों को सब्सिडी का और MSP पर खरीद का फायदा तो मिला। पर धीरे धीरे वे बढ़ते खर्चे के जंजाल में फँसतें चले गए । जब तक सब्सिडी है और MSP बढ़ता रहा है तब तक वे इस एकल फसल प्रणाली को चला पाएंगे। जब यह ख़त्म हो जायेगा तो गेहूं और धान पंजाब से ख़त्म हो जायेगा। क्योंकि खर्चे बढ़ते जायेंगे और आमदनी उतनी नहीं मिल पायेगी और न उस दर से बढ़ पायेगी । और आज भी, MSP पर खरीद चलते हुए भी, पंजाब का किसान भारत में अन्य प्रांतों के किसानों के मुकाबले ढाई गुना ज़्यादा ऋण के नीचे डूबा हुआ है। एक नज़र से देखें तो इन हालातों के लिए हम सब ज़िम्मेदार हैं । हमने कहा पंजाब के किसान को — गेहूं उगाओ और भारत के खाद्य सुरक्षा कि ज़िम्मेदारी सम्भालो। और किसानों ने ये किया। बहुत बढ़िया तरीके से किया। पर नई प्रणाली में अब वे फंस गए हैं । और हम भी फंस गए हैं।

इसका सबसे दुखदायी उदहारण है पराली, जिसे जलाने से दिल्ली तक प्रदूषण फैलता है। हरित क्रांति के तहत हमने पंजाब में धान की खेती शुरू करवाई। उससे पानी का स्तर गिरता गया और इतना बुरा हाल हो गया कि पंजाब सरकार ने 2009 में क़ानून लागू किया जिसके कारण धान की बुवाई मानसून आने पर ही कर सकता था किसान। इससे धान की कटाई का समय 10-15 दिन आगे हो गया और वो गेहूं की बुवाई के समय के पास हो गया। अब एक फसल की कटाई और दूसरी की बुवाई में थोड़ा समय तो चाहिए खेत को साफ़ करने के लिए। पर इतने कम समय में क्या करता किसान? तो पराली, जो धान के डंठल हैं, वो किसान जलाने लगे। 

अब किसान कि मुसीबत का और भी एक कारण है। पिछले 15-20 सालों में हार्वेस्टर का प्रचलन बढ़ गया है धान की कटाई के लिए क्योंकि यह आसानी से काम निपटवा देता है । पर इस से खेत में लम्बी लम्बी डंठल छूट जाती है। हार्वेस्टर बहुत ऊंचाई से काटता है, क्योंकि उसको सिर्फ धान की बाली लेनी है। हाथ ही कटाई में नीचे से काटते हैं तो इतनी पराली बचती नहीं है खेत में। पर मज़दूरों से कटवाने का समय ही नहीं रह पाता है नए कानून के बाद। 

ऊपर से मुसीबत यह है कि जो धान की नई प्रजाति किसान लगा रहे हैं इसमें सिलिका की मात्रा ज्यादा है जिस कारण पशु उसके डंठल खा नहीं सकते ।तो किसान पूरा फंस चुका है। करे भी तो क्या? और हम उसी को दोष दे रहे हैं जिसने हमारी खाद्य सुरक्षा कि नींव बनाई है। धान – गेहूं की खेती जो हरित क्रांति की देन है उसने पंजाब के किसान को डुबाया है, पंजाब कि ज़मीन, पानी, मिटटी, हवा को प्रदूषित किया है, और उसका सबकी सेहत पर भी बुरा असर पड़ा है।