हरित क्रांति ने किस तरह कुपोषण को बढ़ावा दिया?

ऋचा कुमार

हरित क्रांति के दौर में (1960s , 70s 80s ) सारी सरकारी मदद किसानों को सिर्फ गेहूं और धान उगाने के लिए मिली। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उस नीति का ज़ोर था खाद्य सुरक्षा, जिसको अनाज के रूप में ही समझा गया। और अनाज में गेहूं और धान को सबसे महत्वपूर्ण माना गया। जब किसानों ने यह समझा तो उनका रुझान गेहूँ और धान की तरफ बढ़ा। गन्ने के किसानों को भी मदद मिली तो इसको भी बहुत बढ़ावा मिला। पहले किसान मिश्रित खेती में मोटा अनाज, दलहन और तिलहन सब उगाते थे। लेकिन जब इन फसलों को सरकार की तरफ से सौतेला व्यवहार मिला तो किसानो ने इन्हे उगाना कम या बंद कर दिया। 2006 तक आते-आते मोटा-अनाज और चने का रकबा आधा रह गया। जब उत्पादन कम हुआ तो ये चीजें खाने की थाली से भी गायब हो गयी। उधर गेहूँ का उत्पादन इतना ज़्यादा बढ़ गया कि हमारी जरुरत से कहीं ज़्यादा पैदा होने लगा और हमारे पास उसे सस्ते दामों में निर्यात करने के सिवा और कोई चारा नहीं रहा।

इसका हमारी पौष्टिकता पर बहुत गहरा असर पड़ा है। मोटा अनाज छोड़ कर जो चमकीला घिसा हुआ गेहूँ और चावल हम खा रहे हैं जिसमें पौष्टिक तत्त्व ना के बराबर है। सारा पोषण, जिसको फाइबर कहते हैं, मशीनों के द्वारा घिस घिस कर निकाल दिया जाता है। और मोटे अनाज में कई और खनिज पदार्थ थे जो अब हमें मिल नहीं रहे हैं। 2018 में Food and Nutrition Bulletin में छपे एक अध्ययन में बताया गया है कि जो खून की कमी हम देश में देख रहे हैं जिसे (anemia) कहते हैं, वो मोटे अनाज के सेवन को बंद करने का बुरा नतीजा है। 

ये क्यों हुआ? क्योंकि किसान को जब गेहूँ और धान उगाने में फायदा नज़र आया तो उसने मिश्रित खेती छोड़ दी और एकल फसल प्रणाली वाली खेती शुरू कर दी। मोटा अनाज तो ख़त्म ही हो गया। साथ ही भारत दलहन और तिलहन को भारी मात्रा में आयात करने लगा और यह भी आम आदमी कि पहुँच से बाहर हो गए । तो एक तरफ कहा गया की हम खाद्य के मामले में सुरक्षित हो गए,  वहां दूसरी तरफ हम पौष्टिक थाली की बाकी चीज़ों के लिए असुरक्षित बन गए। 1965 में हम 40 मिलियन टन धान, 31 मिलियन टन मोटा अनाज और चना, और 12 मिलियन टन गेहूँ उगाते थे। फिर भी नीतिनिर्धारकों ने गेहूं को बढ़ावा दिया न कि मोटे अनाज को । ऐसा क्यों हुआ? 

इसका एक कारण था कि नए बीज शुरु में गेहूं के ही आये थे। पर इससे बड़ा कारण था कि जो हमारे नीतिनिर्धारक थे वे सब उच्च जाति के थे और उनके खान पान में गेहूं का स्थान ज़्यादा महत्वपूर्ण था। मोटा अनाज गरीबों का, निम्न वर्ग और प्रताड़ित जातियों का खाना माना जाता था। पर ऐतिहासिक तौर पर देखा जाये तो गैहूं कभी भी अलग से नहीं खाया गया है। उसे हमेशा किसी और अनाज के साथ मिलकर बनाया गया है जैसे जौ या चना। उच्च वर्ग के लोग गेहूं कि मात्रा ज़्यादा रखते थे, निम्न वर्ग के जौ कि मात्रा ज़्यादा। पर रोटी मिश्रित आटे की ही बनती थी। और आज यह बात समझ में आ रही है हमको कि अकेले गेहूं को खाने से, और खास तौर पर जो खूब मशीन में घिसा है, वो सेहत के लिए कितना हानिकारक है। अगर हमारे नीति निर्धारकों में औरतें शामिल होतीं तो शायद यह बात उनके मन में रहती और वे ऐसा कदम नहीं उठाते जिस से मोटे अनाज का खात्मा हो जाये।

आम तौर पर लोग समझते हैं कि हरित क्रांति नहीं होती तो भारत में लोग भूखे मर जाते। तो अगर उसके कुछ कुप्रभाव भी हुए हैं तो ठीक ही है, जान तो बची है, लोग मरे तो नहीं हैं। पर यह धारणा ठीक नहीं है। जैसे मैंने पहले बताया है 1965 में जब नए बीज लाये गए, तब भारत में अनाज की कमी इसलिए थी क्योंकि हमने मुफ्त आयात करके, गेहूं और अन्य अनाज के दाम गिरा कर रखे थे, जिस कारण से किसानों ने उनका उत्पादन कम कर दिया था। किसानों को सही दाम उस समय भी मिलता तो हम अनाज खूब ऊगा सकते थे। बल्कि आपको यह सुनकर हैरानी होगी कि भारत गेहूं का निर्यात करता था अंग्रेज़ों के समय में और 1942 तक करता रहा।

लेकिन देश विदेश के लोगों के मन में धारणा बन गयी कि भारत कि ज़मीन ख़राब है, किसानों को जानकारी नहीं है, नए तकनीकों का प्रयोग नहीं कर रहे हैं इसलिए अनाज नहीं पैदा कर पा रहा है। यह गलत धारणा थी। जो भुखमरी और गरीबी तब थी वो आज भी है। क्योंकि उसका कारण अनाज की कमी नहीं थी। उसका कारण था लोगों के पास पैसे की कमी। पैसे नहीं थे अनाज खरीदने के लिए। अंग्रेज़ों के समय भी 150 साल पहले (1870 से लेकर 1902 तक) कई अकाल पड़े जिसमें 1.3 से 3 करोड़ लोगों की मौत हो गयी। यह लोग अनाज के गोदामों के सामने, मालगाड़ियों के भरे डिब्बों के सामने मरे हैं। अनाज था पर उस के दाम इतने बढ़ गए थे कि लोगों के पास उसे खरीदने की ताकत नहीं बची। इतने भी पैसे नहीं बचे कि एक मुट्ठी अनाज नसीब हो सके। और अकाल में सब नहीं मरे। केवल वो लोग मरे जो गरीब थे, कमज़ोर थे, निम्न वर्ग और उपेक्षित जातियों से थे। 

अंग्रेज़ों ने इन सब मौतों को प्रकृति के गले बाँध दिया कि भारत की ज़मीन इतनी ख़राब है इत्यादि। और हम सालों सालों तक उनकी धारणा को मानते चले आये। बल्कि अंग्रेज़ों ने कहा कि जो लोग मर रहे हैं, वे भूरे भारतीय हैं, जो निकम्मे, बेकार, बेवकूफ़ हैं। तो यह प्रकृति का तरीका है निम्न स्तर के अनचाहे लोगों को ख़त्म करने का । सोचिये ! उनकी प्रजातिवादी (racist) मानसिकता कितनी घटिया थी। अंग्रेज़ों ने ना ही अनाज के दामों को नियंत्रित किया, ना ही लोगों तक अनाज पहुँचाया, जो भारत सरकार ने किया है। इसलिए आज़ादी के बाद इतनी भयानक मौतें नहीं हुई हैं हमारे देश में, सूखा पड़ने पर भी । लेकिन, हाँ, हरित क्रांति की अनाज की बौछार के बावजूद, देश में कई लोग आज भी ऐसे हैं जिनके पास इतने पैसे नहीं है कि दो वक्त की रोटी उन्हें मिल सके।